सोमवार, 18 अप्रैल 2022

यूं ही

कभी कभी इक छोटी सी बात भी आपके मन को कितनी तसल्ली, कितना इत्मीनान दे जाती है! हम कल्पना भी नहीं कर पाते। हर आदमी बाहर से चाहे कितना भी मज़बूत या कठोर क्यूं न लगे, पर मन के किसी कोने में नाज़ुक, नर्म सी मखमली कोमलता लिए हुए हृदय रखता है। वह कोना, जहां वह बच्चों सा स्वच्छंद, निश्छल हो जाना चाहता है, बिना किसी परवाह के संपूर्णता के साथ खुद को जी लेना चाहता है, अपने हर इक पल को । उस कोने में वह जी भर कर हंस लेना चाहता है, तो ठठा कर रो भी लेना चाहता है। वहां वह सबका है और सब उसके हैं । मन के उस कोने में उसका जीवन उसकी दुनिया और उसके व्यक्तित्व का सबसे पवित्रतम और सबसे खूबसूरत रुप रहता है। वह रूप जो ईश्वरीय है। बस बात यह होती है, कि ज़िंदगी की रोज़मर्रा की उधेड़बुन, इस दुनियादारी में हममें से अधिकांश उस कोने से काफी दूर निकल आते हैं और दुनिया के तय मानकों के साथ ढल जाने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं।
फिर इक दिन जब कभी हवा के मद्धम शीतल झोंके पर हौले से इठलाती हुई फूलों की पंखुड़ियों को देखते हैं अथवा अपने कमरे के बाहर बालकनी में रखे पौधों की पत्तियों पर बारिश की गिरती बूंदों को महसूस करते हैं, तो लगता है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य तो छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करने में है । आपके अपनों का स्पर्श, उनसे बात कर पाना, उनके साथ वक्त बिता पाना! ये सब अनमोल है। हालांकि हम में से अधिकांश इन सब बातों को जब महसूस कर रहे होते हैं, तब तक एक बड़ा वक्त निकल चुका होता है और साथ रह जाती है तो बस इक कशिश, कि काश! हम वापिस उस मासूम से दौर में लौट पाते.....!
-वैभव